आओ बैठें, बातें करें

आओ बैठें , बातें करें
भूल से गये हैं
मीठे से तीखे से शब्दों का स्वाद
आओ बैठें…
बस दिन को रात, रात को दिन करें जा रहें हैं
लम्हे फिसल रहें हैं, हम खर्च होते जा रहें हैं
‘कैसे हो?’ इसका जवाब हर बार ‘बढ़िया’ तो नही होता
इस ‘बढ़िया’ के नीचे क्या छुपा रहें हैं ?
दिन में खुद से समझौता कर लेते हैं
रात को खुद से ही खफा हो जाते हैं |
ख़यालों से कुछ देर लड़ते हैं फिर खुद को ही चुप करा देते हैं
दिमाग और दिल की लड़ाई मे मूक बनें रहते हैं
और ना जाने रात के अंधेरे में कैसा नशा है
दिल अकसर दिमाग को हरा ही देता है
एक chhoti सी खुशी को इतना बड़ा बना देता है
और वहीं एक chhote से दुख को पहाड़ सा दिखाता है |
फिर सुबह होते ही हमारे बहाने शुरू हो जाते हैं
जो रात को खुद से वादे किए थे, उनमे मुश्किलो के अलावा अब कुछ दिखता नही
फिर चुपचाप दिन गुज़ार देते हैं
पर कब तक?
चुप बैठें रहें तो दिमाग़ दिल, दिल दिमाग़ को कोस्ता है
कहने जाओ किसी से तो सामने वाला भी उसी उलझन में फसा दिखता है
बस फिर क्या, शब्द नहीं मिलते हैं …
आजकल शब्द लालची और हम बड़े हो गये हैं
अपना अपना चाय का कप उठाते हैं
और फोन की screen पे देखने लग जाते हैं |
बचपन में सिखाया था
माँ हो, बाप हो, भाई हो, बहेन हो, दोस्त हो, पड़ोसी हो या आपका कुत्ता ही क्यूँ नहीं
माफी, शुक्रिया और प्यार का इज़हार …
ये शब्द तुरंत कह देने चाहिए, और बार बार कहने चाहिए
पर अब तो ये भी बहुत सोचने पे निकलते हैं
ये तो अच्छी बातें हैं ना? कह देनी चाहिए |
बड़े जो हो गये हैं
पर बड़ा होना नहीं चाहते
बातें तो बूढ़ा गयीं हैं
पर जनाब, खामोशी बच्चों जैसी है
गुस्सा बहुत आने लगा है
कभी खुद पे, कभी औरों पे
उसके भी अलग अलग तरीके हैं
कभी आँखों में भर आता है, कभी होटो से निकल जाता है
और कभी तो अक्षरों का रूप देके कहीं बेखेर कर रख दिया जाता है |
हम हिस्से हैं जिन किस्सों के, अलग अलग तराज़ू पे तौलते हैं
खुद ने लिखा हो तो सुख दुख सब मंज़ूर है
लड़ भी जाएँगे खुद की ज़िद्द के लिए
मगर किसी और ने लिख दिया हमारे लिए
अरे फिर तो, ये कैसे?
कहाँ फस गये हैं
जो किताबो में बड़ी बड़ी बातें पढ़ीं थी
उनपे निबंध लिखे थे
वो क्या बस exam पास होने के लिए थे
दुनिया सुधार देंगे लगता था
यहाँ चार लोगों की सोच नही बदल पा रहें हैं
समाझ क्या घर पे विचारो की बहस नहीं कर पा रहें हैं |
ये ज़िद्द ग़लत है? या ये रिश्ते कच्चे हैं?
मैं भी हूँ इसी कशमकश का हिस्सा, तुम भी हो
आओ तुम्हारी थोड़ी सुनते हैं, थोड़ी तुम मेरी सुनो |
आओ बैठें
क्या बोलना चाहिए क्या नहीं, भूल जाते हैं
इस दुनिया, दुनियादारी को भूल जाते हैं
एक दूसरे से पूछते हैं …
क्या करना चाहते थे, क्या कर रहे हो?
नासमझी मे जो खुद से वादे कर जाते थे, क्या वही नहीं ‘तुम’ थे?
जब ज़िंदगी ने अपने उसूल अपनी शर्तें नहीं बताईं थी
तो कैसा देखते थे अपने आप को बड़ा होकर?
आओ बैठें
बातें करें …
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3 thoughts on “आओ बैठें, बातें करें”

  1. This hits the point. I think the essence of some feelings is better expressed through the medium of a particular language and this one resonanted with my thoughts so much that it almost felt like you penned down my 3 AM thoughts. Yet another beautiful piece. 😊

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